बहुत प्राचीन बात है।एक गांव में एक साधु रहा करते थे।लोग दूर-दूर से शिक्षा ग्रहण करने के लिए आश्रम में आया करते थे।लोग अपने बच्चों को शिक्षा गृहण करने के उद्देश्य से अपने बच्चों को उनके आश्रम में भेजते थे।एक दिन महात्मा जी से मिलने के लिए एक आदमी आया उसने कहा गुरु जी मुझे अपने श्रीचरणों में जगह दे दीजिए। अब मेरी कोई कामना बाकी नहीं रही है। मैं आश्रम में रहकर आपकी सेवा करूंगा और भगवान का भजन करूंगा। मुझे अब इस जीवन से मोक्ष चाहिए।साधु जी समझ गए इसकी कामना सच्ची है।


महात्मा जी ने कहा-‘पुत्र! आश्रम की परम्परा है कि तुम स्नान करके पवित्र हो और भगवान के आगे संकल्प धारण करोगे इस कार्य के लिए तुम कल प्रातः स्नान करके आश्रम आ जाना।फिर वह आदमी आश्रम से चला गया।महात्मा जी ने इसकी परीक्षा लेने के लिए सोचा फिर उन्होंने अपने एक शिष्य को बुलाया और कहा कल सुबह यह नया शिष्य आयेगा। जैसे ही यह आश्रम के नजदीक आये, तुम इस प्रकार से झाड़ू लगाना कि उसके चेहरे पर धूल गिर जाए।शिष्य ने महात्मा जी की बात मान ली।

अगले दिन जैसे ही वह आदमी स्नान करके आश्रम के नजदीक आया उस शिष्य ने तेजी से झाड़ू लगाना शुरू कर दिया। जिसके कारण उस आदमी के पूरे चेहरे में धूल चली गई। उसके क्रोध की सीमा न रही। पास पड़े पत्थर को उठाकर वह उस शिष्य को मारने के लिए दौड़ा वह शिष्य वही झाड़ू फेंककर साधु जी के पास चला गया।



फिर महात्मा जी ने कहा अभी तो तुम जानवरों के समान लडने के लिए दौड़ते-चिल्लाते हो। तुमसे अभी यहाँ शिक्षण कार्य नहीं होगा। तुम एक वर्ष के बाद आना जब तक अपने आप में सुधार करो।

उस आदमी की महात्मा जी के ऊपर श्रद्धा भी सच्ची थी। एक वर्ष पूरा होते ही वह फिर आश्रम गया।महात्मा जी ने आदेश दिया-  तुम कल स्नान करके प्रातः आना।’

उस आदमी के जाते ही महात्मा जी ने अपने एक शिष्य को फिर बुलाया।और कहां इस बार मार्ग में झाड़ू इस तरह से लगाना कि धूल के साथ-साथ उस पर झाड़ू की हल्की सी चोट भी लग जाए।अगले दिन स्नान-ध्यान करके वह व्यक्ति जैसे ही आश्रम तक पहुंचा। उस शिष्य ने महात्मा जी के आदेश अनुसार जानबूझकर झाड़ू उस पर इस प्रकार से छुआ कि कपड़े भी गंदे हो गये।और उसे हल्की सी चोट लग गई।इस बार उस आदमी ने शिष्य को भला बुरा कहना शुरू कर दिया।जब वह महात्मा जी के पास वापिस पहुंचा, संत ने कहा-‘तुम्हारी काबिलियत में मुझे संदेह है। एक वर्ष के बाद यहाँ आना।’और कहा जब तक अपने आप में सुधार करो।

एक वर्ष और बीत गया। फिर वह आदमी महात्मा जी के पास आया। उसे पूर्व के भांति स्नान-ध्यान करके आश्रम में आने की आज्ञा मिली इस बार उस आदमी ने अपने अंदर पूर्ण तरह सुधार कर लिया था।


महात्मा जी ने अपने एक शिष्य को कहा।इस बार सुबह जब वह आये तो तुम इस बार अपनी कचड़े की टोकरी उस पर उड़ेल देना।सुबह जैसे ही वह आदमी आश्रम पहुँचा। शिष्य ने  पूरा कूड़ा-कचरा उस पर उड़ेल दिया।इस बार उस आदमी ने  शिष्य के सामने अपना मस्तक झुका कर वहां से चला गया।

वह दुबारा घर गया स्नान करके आश्रम में उपस्थित हुआ।और उस आदमी ने महात्मा जी से कहा।मैंने आपके आशीर्वाद से क्रोध-रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त की है।फिर महात्मा जी ने उस आदमी को  गले लगा लिया और बोले- ‘पुत्र! तुमने अपने क्रोध पर काबू पा लिया है अतः अब तुम आश्रम में कार्य करने के सच्चे अधिकारी हो।

शिक्षा = इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है। बिना क्रोध पर विजय प्राप्त किए हम किसी ज्ञान को नहीं प्राप्त सकते।