कहते हैं हरि अनंत हरि कथा अनंता भगवान श्री हरि नारायण के अनंत अवतार हैं और अनंत कथाएं हैं।अन्य रामायण में उल्लेख आता है। कि जो सोने की लंका थी, वह भगवान शिव की थी। भगवान शिव ने माता पार्वती के लिए यह लंका नगरी बनवाई थी।कथा इस प्रकार है।
एक समय की बात है एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा प्रभु मुझे कैलाश पर्वत पर रहते रहते मेरा मन भर गया। अब मुझे यहां रहने का मन नहीं करता। भगवन.. मुझे अन्य देवताओं की तरह हमारा भी एक छोटा सा महल ओ मेरी यह इच्छा है।भगवान शंकर ने माता पार्वती की बात मानी और एक स्वर्ण महल बनाने के लिए सोचा फिर भगवान शंकर ने वास्तुकार विश्वकर्मा का आह्वान किया फिर वास्तुकार विश्कर्मा जी ने शुभ मुहूर्त निकाल कर स्वर्ण महल का काम शुरू कर दिया।कुछ समय बाद विश्कर्मा जी ने एक भव्य नगरी का निर्माण किया जिसका नाम लंका रखा गया। तीनों लोको में भगवान शिव की जय जयकार होने लगी।
फिर भगवान शिव को एक ही बात की चिंता थी कि गृह प्रवेश कौन करेगा ? तब भगवान शिव ने रावण को को गृह प्रवेश के लिए बुलाया। जब रावण गृह प्रवेश के लिए लंका आया तो रावण को लंका बहुत अच्छी लगी। पूरी लंका स्वर्ण की थी। जब रावण ने लंका को देखा उसके मन में इच्छा हुई काश ऐसा महल मेरा भी हो रावण का मन स्वर्ण महल में आ गया था।तब रावण ने विधि विधान के साथ ग्रह प्रवेश किया।
जब रावण ने घर प्रवेश का काम पूरा किया तब माता पार्वती ने रावण से कहा, रावण की अपने मन के अनुसार दक्षिणा मांग लो।पहले तो रावण ले दक्षिणा लेने के लिए माता पार्वती से मना किया। माता पार्वती के अनुरोध करने पर रावण ने कहा।मैया यदि आप मुझ पर प्रसन्न है। यदि आप मुझे कुछ देना चाहती है। मुझे यह सोनी के लंका दक्षिणा में दे दीजिए।
रावण की बात सुनकर माता पार्वती को एक पल बहुत क्रोध आया, परंतु पास में बैठे भगवान शंकर ने बिना कुछ कहे रावण को तथास्तु कह दिया और रावण सोने की लंका दक्षिणा में दे दी।तब माता पार्वती ने सोचा जिस प्रकार आज रावण ने लंका दक्षिणा में ली है उसी प्रकार यह लंका में भस्म करूंगी।कहां जाता है जिस समय हनुमान जी लंका जलाने के लिए उड़े उस समय माता पार्वती पूछ में विराजमान होकर पूरे लंका को भस्म कर दिया।
तब से सोने की लंका रावण की लंका के नाम से प्रसिद्ध हुई



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Jai Shri Ram
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